मैं आपको मेरी कहानी बताता हूँ ,२५ वर्ष की उम्र होते ही मेरे घर वाले शादी के लिए दबाव बनाने लगे ,पूरा समाज अपना कर्तव्य समझते हुए मेरे लिए लड़की ढूढ़ने में लग गया ,मैं अपना करियर बनाना चाहता था ,बहार रहकर आजादी के पंख लगाना चाहता था ,लेकिन घर वालो पर समाज का और मुझपर घरवालों का दबाव आने लगा मैंने घरवालों को समझाया की मेरे पास कोई अच्छी नौकरी नहीं है मैं अपनी बीवी की जिम्मेदारी नहीं संभल सकता तो उन्होंने मुझे कहा कि पापा कि नौकरी है ,हम है ना हम तुम दोनों कि जिम्मेदारी उठाएंगे तू आराम से तेरा कॅरिअर बना ,मैंने दूसरी बात कही कि आप शादी होते ही आप पोते की मांग करोगे वो इसके लिए भी राजी हो गए ,कुछ लड़कियों के बाद मेरे गांव में ही एक अच्छी लड़की ढूढ़ कर उन्होंने मुझे दिखा दी ,हमने बात कि एक दूसरे को पसंद किये और लगभग फिर एक साल तक एक दूसरे से चुपके चुपके मिलते रहे ,तोहफे का आदान प्रदान होता रहा ,गांव कि सोच थोड़ी पुरानी होती है समाज कि आँखों में ये प्रेम वाली बात थोड़ी खटकने लगी ,अब वो इन बातो को लेकर ताने कसने लगी , मेरी मंगेतर भी थोड़ी दुःखी हुईं हम दोनों को शादी कि कोई जल्दी नहीं थी हमे तो आनंद आ रहा था ,घरवाले दोनों पक्ष हम पर दबाव बना रहे थे , तो मैंने शादी के लिए है कर दी ,किस्मत से शादी के तुरंत बाद नौकरी भी मिल गयी ,लेकिन घर वाले अपना एक लक्ष्य पूरा कर चुके थे वो अपना अगला लक्ष्य एक पोता चाहते थे जैसा कि वादा किया उससे मुकरते हुए उन लोगो कि दुहाई देने लगे जिनके बच्चे हो चुके थे ,पड़ोस कि आंटिया लड़की के गर्भधारण छमता पर संदेह करने लगी,समाज तो मुझे ऐसे घु रहा था जैसे मुझमे कोई कमी तो नहीं ,दोनों पक्षों के तरफ से मन्नतो का दौर चल पड़ा ,जबकि सही बात तो ये थी कि हम अभी अपना जीवन जीना चाहते थे करियर बनाना चाहते थे खैर मेरी बीवी कब तक ल्प्गों कि सुनती ,हमें बच्चे का प्लान करना पड़ा ,खुसी खुसी हमने घरवालों को पोता का तोहफा दिया ,घरवालों ने दबाव बनाकर एक और लक्ष्य पूरा कर लिया ,अब घरवालों ने न्य लक्ष्य बनाया है कि जल्दी मैं सरकारी नौकरी में लग जाऊ लेकिन शर्त ये है कि मुझे अपनी वर्तमान नौकरी करते हुए तैयारी करनी होगी ,ताकि उनपर मैं आर्थिक बोझ न बनाऊ ,जैसा कि उन्होंने हमारी जिम्मेदारी सँभालने का वादा किया था वो मुक्कर चुके है ऐसा लगता है वो हम पर हस्ते हुए कह रहे हो कि हमने तो मुर्ख बनाया तुम ही बेवकूफ थे जो हम पर बिस्वास किया ,, सास बहु के झगड़ो का दौर चल पड़ा मम्मी-पापा अपना हर बात मनवाना चाहते है , आधी तनख्वाह घर पर देने के बावजूद ,बाकी कि आधे तनख्वाह के लिए मैं ताने सुनता हूँ ,मैं कुछ बोली तो इमोशनल ब्लैकमेल किया जाता है ,कई बार मैं और बीवी अकेले रोते है ,घूमने जाना छुट्टिया मानना मजे करना तो दूर कि बात है,और कभी कभार एक और बच्चे कि डिमांड उनके मुँह से निकल जाती है तो मेरे पास अब इतनी जिम्मेदारियां है -
।,अपनी बीवी को ख़ुश रखना
२,अपने माता पिता को खुश रखना
३,दोनों के झगड़ो को सुलझाना
४, नौकरी भी करना
५,पैसो के लिए अतिरिक्त भी काम करना
६,अपने बच्चे के सामने हमेशा खुश रहना ताकि अच्छा संस्कार हासिल कर सके
७,नई सरकारी नौकरी हासिल करना
८,और हो सके तो इसके बाद घरवालों के दबाव में एक और बच्चा पैदा करना जो मैं कभी नहीं चाहता।
मैं आपसे अंत में इतना ही कहना चाहता हूँ कि आज्ञाकारी होना फालतू है,अपने समाज और माता पिता कि बातो में न आये ,उनके पास थोड़ी सम्पति है बाकी सब मात्र आपसे अपेक्षाएं ही रखते है जो कभी ख़तम नहीं होती , अपनी विवेक से सोचे विरोध करे और अपने दिमाग से काम ल।
जीवन यात्रा कैसी चल रही है कमेंट करके बताये।
